…इसलिए ऐ शरीफ इंसानो
जंग टलती रहे तो बेहतर है.
जंग टलती रहे तो बेहतर है.
आप और हम सभी के आंगन में
शमा जलती रहे तो बेहतर है.
शमा जलती रहे तो बेहतर है.
– साहिर लुधियानवी
पुलवामा हमले के बाद क्या किया जाए? भारत के पास क्या विकल्प हैं? गलियों और नुक्कड़ों में बहस चल रही है कि ये कर दें और वो कर दें. एक न्यूज चैनल ने अपने न्यूज पैकेज में कविता की ये लाइन चेंप डाली –
याचना नहीं अब रण होगा,संघर्ष बड़ा भीषण होगा.
दिमाग गर्म है इसलिए युद्ध का उन्माद इस वक्त हमें घेरे हुए है. पर पुलवामा हमले के बाद समझदारी के ये 5 कदम भारत उठा सकता है.
# 1
पहली चीज, भीड़तंत्र के उन्माद से बचने की जरूरत हैं. सोशल मीडिया पर आ रहा रिएक्शन नसें फुलाने वाला है, लेकिन उस राह में पेचो-ख़म बहुत हैं. ये सही है कि 40 जवान खोकर पूरा देश दुखी है, लेकिन देश की सुरक्षा और कूटनीति से जुड़े फैसले भावुकतापूर्ण जल्दबाज़ी में नहीं लेने चाहिए. डिप्लोमेसी चीज़ ही ऐसी है, क्या कीजिएगा.
नरेंद्र मोदी सरकार अगर आज निशाने पर है तो वो अपना ही बोया काट रही है. विपक्ष में रहने के दौरान उन्होंने बातें ही इतनी छौंकी थीं कि लोग तो याद तो दिलाएंगे ही. लेकिन ये सब कुछ अंतत: एक अंदरूनी राजनीतिक घटनाक्रम है. फिलहाल रक्षा नीति को इससे अलग रखना चाहिए.
जो बड़े-बड़े शांतिप्रिय अब युद्ध के उन्माद को न्योता दे रहे हैं, उनके भी पुराने स्टैंड अलग थे. भारत कम से कम इस दौर में युद्ध की आर्थिक अस्थिरता अफोर्ड नहीं कर सकता.
# 2
फिर क्या मिलिट्री के मोर्चे पर हम कुछ ना करें? ऐसा नहीं है. इंटरनेशनल मंचों पर कहने के लिए हमारे पास बहुत कुछ है और ये सही मौका है जब हम मिलिट्री के मोर्चे पर भी दो कदम आगे बढ़ सकते हैं. सेना जानती है कि दो कदम कैसे बढ़ा जाता है.
लेकिन इस सामूहिक सहमति को याद रखा जाए कि बड़े सैन्य ऑपरेशन आसान नहीं होते. आतंकी ट्रेनिंग कैंपों पर सर्जिकल एयर स्ट्राइक, कोवर्ट एक्शन और सीमा के बहुत करीब जवानों को तैनात करने में रिस्क है. मामला और बिगड़ेगा और अपने जवानों की जान का खतरा भी होगा.
बड़े मिलिट्री ऑपरेशन से न तो इंटरनेशनल कम्युनिटी खुश होगी और न ही ग्लोबल मार्केट. जो लोग 40 के बदले 80 सिर मांग रहे हैं, वे भी बदले की रणनीति और इसकी बारीकियों के बारे में ‘क्लूलेस’ हैं.
# 3
पठानकोट, पैम्पोर, उड़ी और पुलवामा आतंकी हमले पड़ोसी देश के सैन्य हमले नहीं थे. इन्हें ‘नॉन-स्टेट एक्टर्स’ ने अंजाम दिया, पाकिस्तानी मिलिट्री लीडरशिप की मदद से. ऐसे हमलों का जवाब पारंपरिक मिलिट्री तरीके से नहीं दिया जाता. बेहतर है कि इस गुस्से और ऊर्जा कहीं और लगाया जाए. हम पहले अपनी सुरक्षा टीप-टॉप करके इंटरनेशनल मंच पर पाकिस्तान के खिलाफ माहौल बनाएं.
कोशिश हो कि ज्यादा से ज्यादा ताकतवर देश इस बात पर यकीन करें कि पाकिस्तान आयातित आतंकवाद एक ‘ग्लोबल खतरा’ है.
इस मोर्चे पर हम पहले से ही डिप्लोमेटिक कोशिश कर रहे हैं. उसमें थोड़ा और ईंधन फूंका जाए. ये कोशिश जरा भी कामयाब हुई तो लॉन्ग टर्म में बहुत फलेगी. ये कामयाबी व्हाइट हाउस से आने वाली निंदा से कहीं ज्यादा अहम होगी.
# 4
पुलवामा आतंकी हमले के पीछे हम अपनी लापरवाही को नहीं छुपा सकते. पाकिस्तान के खिलाफ आक्रोश में इससे बचना नहीं चाहिए, सामना करना चाहिए.
भारतीय सेना (सीआरपीएफ) की इतनी महत्वपूर्ण मूवमेंट, इतनी ‘वल्नरेबल’ कैसे हो सकती है. इसकी पूरी जांच हो.
पता किया जाए कि पठानकोट हमले, उड़ी कैंप वाले आतंकी हमले के बाद भारतीय सेना की सुरक्षा बढ़ाने के लिए क्या किया गया था. कुछ किया भी गया था या नहीं?
# 5
इस हमले की पृष्ठभूमि में हालिया कश्मीर क्राइसिस है, इस आशंका को खारिज नहीं कर सकते हैं. इसलिए सरकार को दो नीतियां चाहिए. एक, जवानों को सुरक्षित रखने के लिए. दूसरी एक पॉलिटिकल रणनीति, कश्मीर की अस्थिरता से निपटने के लिए.
लोग मिलिट्री के मोर्चे पर ‘अल्ट्रा एग्रेसिव’ होने की मांग कर रहे हैं, लेकिन भारत की रणनीतिक ताकत कभी उसका एग्रेशन नहीं रहा.
उसे कुछ एग्रेसिव होना चाहिए, इससे असहमति नहीं है. लेकिन इस चक्कर में उसे अपनी असल रणनीतिक ताकत से ध्यान नहीं हटाना चाहिए. सालों-साल से पकाई गई रणनीति को एक झटके में नहीं बुहार देना चाहिए.

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